Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
जन्तोर्वेदनशब्दार्थबोधो दुःखकरः परः ।
निष्कृत्य ज्ञप्तिशब्दार्थबोधं तिष्ठ यथास्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणी के लिए सबसे
बढ़कर दुःख पैदा करनेवाला वेदनशब्द और उसका अर्थ जानना है, इसलिए वेदनशब्द ओर उसके
अर्थ का परिज्ञान समूल नष्टकर अपने असलस्वरूप में अवस्थित रहिये