Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सर्वावबोधावसरे ज्ञप्तिशब्दार्थयोरिह ।
निर्वाणोदय इत्येव परमोमिति शाम्यताम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यवहारकाल में उसका उच्छेद किस तरह करना चाहिए, इस पर कहते हैं /
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय रूप त्रिपुटीभान जिस समय होता है, उस समय व्यावहारिक ज्ञानरूप
शब्द ओर उसका अर्थ प्राप्त होता है उन दोनों की यथायोग्य सर्वार्थरूप कुटस्थ चैतन्य तथा
सर्वशब्दरूप "ओम् शब्द में लक्षणाकर कूटस्थ चैतन्यमात्र ही आत्मा है और यही मोक्ष का आविर्भाव
है, यों सुदृढ़ निश्चय कर ज्ञानी पुरुष समस्त विक्षेपात्मक प्रपंचों का परित्याग कर व्यवहार करे