Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
कर्ममूलनिकाषेण संसारः परिशाम्यति ।
सुविचारितमन्विष्टं यावत्कर्म न विद्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
मूलसहित कर्मों का विनाश करने से संसार अशेषरूप से शान्त हो जाता है । जब कि
आत्मतत्त्व भलीभाँति विचारित एवं प्रत्यक्ष किया जाता है तब समूल कर्मों का विनाश हो जाता
है