Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अङ्कुरोऽनुभवत्यन्तर्वृक्षपत्रफलं यथा ।
तथा जगदहंत्वे ज्ञः स्वात्मा स्वात्मखमप्यलम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
किस तरह की वह संविद्-भ्रान्ति अज्ञानियों द्वारा अनुभूत होती है, यह कहते है/
जैसे अंकुर अपनी आत्मा में ही वासनात्मक वृक्ष, पत्र, फल आदि का अनुभव करता है, वैसे
ही अज्ञानी पुरुष वस्तुतः आत्मस्वरूप होता हुआ भी आकाश के सदृश स्वच्छ ओर विशाल अपनी
आत्मा का जगत् और अहंकाररूप से भलीभाँति अनुभव करता है