Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
संविद्भ्रान्तिविचारेण भ्रान्त्यलाभविलासिनः ।
विजयध्वं विषादं माऽऽगता ज्ञास्तज्ज्ञता हि वः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अब महाराज वस्तिष्ठजी सशरी श्रोताओं को सम्बोधित कर कहते हैं /
हे उपस्थित विद्वानों, आप लोग किसी तरह का विषाद न करें, किन्तु मेरे कथन के अनुसार
विषाद के हेतु सम्पूर्ण प्रपंच संवित् की एकमात्र भ्रान्ति (विवर्त) है, यों विचारकर भ्रान्ति ओर
उसके विषय की तत्त्वतः परीक्षा करने पर निःस्वरूप सिद्ध होने के कारण उनकी किसी तरह
प्राप्ति न हो सकने से तेजस्वी होते हुए आप लोग सबके ऊपर अपना स्थान जमाइये । क्योंकि
मेरे उपदेश से सचमुच आप लोग वस्तुतत्त्व को जान गये हैं । तात्पर्य यह है कि आप लोगों
में अब अज्ञता नहीं रही