Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
धूमस्य स्फुरतो व्योम्नि यथा गजरथादयः ।
व्यूहा धूमान्न ते भिन्नास्तथा सर्गाः परे पदे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश में स्फुरित हो रहे नीहारधूम्र के हाथी, रथ आदि आकार दिखाई
देते है, परन्तु वे आकार नीहारधूम्र से पृथक् नहीं हैं, वैसे ही परमपद में ये सर्ग भी हैं अर्थात्
परमपद से भिन्न यह सृष्टि नहीं है