Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अहंत्वसर्गरूपेण संवित्संविन्मये परे ।
स्फुरत्यम्भोम्भसीवातो नानातेयं किमात्मिका ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानस्वरूप अज्ञात आत्मा में अहन्ता की सृष्टि के रूप से ज्ञानरूप आत्मा ही ऐसे
भासित होता है जैसे जल में जल तरंगरूप से भासित होता है, इसलिए इस अनेकता का रूप
ही क्या ?