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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

अन्तरस्तंगतोऽक्षुब्धो बहिरस्तंगतः शमी । विद्यते चोदितो यस्य स मुक्त इति कथ्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानी पुरुष में भीतर-बाहर सबकी वासनाएँ बाधित हो बुकी हैं; इसमें क्या प्रमाण 2 इस थका पर अक्षोभ, शम आदि ही प्रमाण हैं. इस आशय से कहते हैं । जो पुरुष भीतर के मानसिक तरंगों से क्षुब्ध नहीं होता और बाहर के तरंगों से भी क्षुब्ध नहीं होता, जो शान्ति से शोभित है और जो सदा प्रसन्न रहता है, वह मुक्त कहा जाता है