Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यथा सुखं यथारम्भं यथा नाशं यथोदयम् ।
यथा देशं यथा कालमजराः शान्तमास्यताम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए हे श्रोताओं, यह सारा संसार जैसे उत्पन्न होता है, जैसे स्थित है,
जैसे अपने कार्यों का आरम्भ करता है, जैसे सुखदुःख का अनुभव करता है, जैसे नष्ट होता
है ओर जिस तरह के इसके देश-काल हैं इन सब बातों का उत्पत्ति-स्थिति आदि प्रकरणों
में कही गयी युक्तियों से निश्चय कर यानी ये सब मिथ्या हैं, यह निश्चय कर अजर होते हुए
शान्तरूप से आप लोग स्थित रहिये