Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इष्टानिष्टोपलम्भेषु शान्तो व्यवहरन्नपि ।
शववन्नान्यतामन्तर्निर्वाणोऽनुभवत्यलम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इष्ट और अनिष्ट वस्तुओं की प्राप्ति के लिए
व्यवहार कर रहा भी मुक्त पुरुष मुर्दे के सदृश अन्यता का अनुभव नहीं करता, किन्तु अपनी
आत्मा में चित्त का समर्पण कर स्वस्वरूप का ही अनुभव करता है