Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अमनोवासनाहंता धत्ते यच्च जगच्चिरम् ।
जीवतोऽजीवतश्चैव चिज्जीवः स परं पदम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो जीवन्मुक्त पुरुष
हैं उनकी अहन्ता मनोजनित वासना से रहित ही है | वह अहन्ता देहनाश-पर्यन्त जो जगत्
धारण करती है ओर उसका भोक्ता जब तक जीवन धारण करता है, वह सब चिद्रूप जीव
ही है उसमें तनिक भी जडता नहीं है, यही परमपद है