Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सत्तैव जडवाहेन दुःखभाराय केवलम् ।
नृणां पाशावबद्धानां पोतकानामिवार्णवे ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इन सव बातों से निष्कर्ष यही निकला कि जीव जगत् की जड़रूप से सत्ता मान लेना ही अनर्थ
है, इस आशय से कहते हैं ।
जैसे समुद्र में जहाजों के भार-वहन के लिए आधारभूत जलसत्ता ही केवल कारण है वैसे
ही संसाररूपी फन्दे से बधे गये मनुष्यों को दुःखरूपी भार ढोने के लिए जीव-जगत् की
जड़रूपसत्ता ही कारण है