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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

मोक्षसत्ता श्रयति तं नाज्ञानानुभवादिव । मृतेन यत्किल प्राप्यं जीवन्प्राप्नोति तत्कथम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जो मृत पुरुष के द्वारा प्राप्त किया जानेवाला स्वर्ग है, वह क्या जीवित पुरुष द्वारा किसी तरह प्राप्त किया जा सकता है ? अर्थात्‌ मृत पुरुष लभ्य स्वर्ग जैसे जीवित पुरुष का जीवन अपराध से मानों आश्रय नहीं लेता, वैसे ही मोक्ष सत्ता अज्ञानी पुरुष का अज्ञानगत जड़तानुभव के अपराध से मानों आश्रय नहीं लेती