Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यद्यत्संकल्पयते तत्तत्संकल्पादेव नाशभाक् ।
न संभवति यत्रैतत्तत्सत्यं पदमक्षयम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
मोक्षरूप परमपुरुषार्थ मानने की आवश्यकता क्या है 2 ग्रांकल्पिक स्वर्ग आदि फलों मे से
किसी एक को नित्य पुरुषार्थ रूप मान लीजिये, इस पर कहते हैं /
जो-जो पदार्थ संकल्प से सिद्ध होता है, वह सब संकल्प से हीन नष्ट भी होता है ।
इसलिए जहाँ इस संकल्प का सम्भव नहीं है, वही अक्षय पद मोक्ष सत्य है