Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
नान्यो न चाहमस्मीति भावनान्निर्भयो भव ।
सत्यं युक्तं भवत्येतद्विषमप्यमृतं यथा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
न तो अन्य
कोई है ओर न मैं ही हूँ, इस तरह की अनहंभावना से आप निर्भय हो जाइये । अज्ञदृष्टि यद्यपि
इस अनहंभावना को भयावह समझकर ग्रहण नहीं कर सकती, तथापि परमार्थ दृष्टि उसे सत्य
अमृतरूप समझकर ग्रहण ऐसे कर सकती है, जैसे अज्ञदृष्टि से भयंकर विष समझकर छोड़े
गये अमृत को परमार्थ दृष्टि ग्रहण करती है