Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
जडं देहादि चित्तान्तं विचार्य सकलं वपुः ।
लभ्यते नाहमस्मीति तस्मान्नास्मीति सत्यता ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
सरमे चत्यता का उपपादन करते है /
जड-देहादि से लेकर चित्तपर्यन्त सम्पूर्ण शरीर विचारकर देखने से अहंरूप उपलब्ध नहीं होता
। अतः जड़ देहादिरूप 'मैं नहीं हूँ” एकमात्र यही सत्यता है