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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

शान्ताशेषविशेषाणामहंतान्ताविचारणात् । केवलं मुक्ततोदेति न तु किंचिद्विनश्यति ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण है कि सम्पूर्ण शान्ति की कीमारूफी मोक्ता अहंकार की शन्ति ही हैं / जैसे जमे हुए घी के पिघल जाने पर घी का कुछ नाश नहीं होता, कैसे ही अहन्ता का नाश होने पर आत्मा का अपुमात्र भी कुछ नाश नहीं होता / अहन्ता के नाश से सर्वनाश हो जायेगा, यो विचारकर भय नहीं करना चाहिए, इस्र आशय से कहते हैं / विचार करने से जिन पुरुषों के सम्पूर्ण विशेष शान्त हो चुके हैं उनके लिए अहन्ता का नाश करनेवाली केवल मुक्तता उदित होती है । उनका वस्तुतः कुछ भी नष्ट नहीं होता