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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अहंतैवालमज्ञानादज्ञत्वस्य निदर्शनम् । न हि तज्ज्ञस्य शान्तस्य ममाहमिति विद्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, जैसे धूम्रज्ञान अग्निज्ञान का हेतु पर्याप्त है, वैसे ही अज्ञान से उत्पन्न अहन्ता ही अज्ञान की सत्ता में हेतु पर्याप्त है, जो तत्त्वज्ञानी शान्तपुरुष है, उसे ममता या अहन्ता नहीं रहती