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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अहंतामलमुत्सृज्य निर्वाणः खमिवामलः । सदेहमपदेहं वा ज्ञस्तिष्ठति गतज्वरः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, इस अहन्तारूपी मल का सर्वथा त्यागकर निर्मल हो चिदाकाश की नाई मोक्षस्वरूप ज्ञानी पुरुष सांसारिक सर्वविध सन्तापो से शून्य स्थित रहता है । चाहे वह सदेह रहे या बिना देह का