Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न तथा शरदाकाशं न तथा स्तिमितोऽर्णवः ।
पूर्णेन्दुमध्यं न तथा यथा ज्ञः परिराजते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता के दूर चले जाने से ज्ञानी पुरुक निर्मल ओर विक्षेपशून्य परिपूर्ण हो जाता हैं, यह वर्णन
करते हैं ।
जैसा अहन्ता से रहित ज्ञानीपुरुष सुशोभित होता है वैसा न तो शरत्काल का आकाश, न
प्रशान्त सागर और न परिपूर्ण चन्द्रमा का मध्यभाग ही शोभित होता है