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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

निर्वासनं मननमेवमुदाहरन्ति मोक्षं विना भवति तन्न च जातु बोधात् । सन्नो जगद्भ्रम इतीह परः प्रबोधो न प्रत्ययोऽत्र यदतः सुचिराय बन्धः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अहन्ता के नाशक सम्पूर्ण द्वैतनाशपूर्वक जो ब्रह्मभाव से मन की स्थिति है, उसी को श्रुतियाँ ओर विद्वान्‌ लोग मोक्ष कहते हैं और वह मोक्ष तत्त्वज्ञान के बिना कभी भी नहीं होता । सर्वोत्तम ज्ञान भी यही है कि यह जगद्भरम परमार्थ कभी नहीं हो सकता, यह मोक्षशास्त्र में प्रसिद्ध है । तात्पर्य यह कि यह जगत्‌ तो एकमात्र भ्रम है, सद्रूप आत्मा ही परमार्थ है । चूँकि इस ज्ञान में “नेह नानास्ति किंचन" इत्यादि श्रुति से कराया जा रहा भी विश्वास पुरुष के प्रबल रागादि दोष के कारण तथा जगत्‌ में दृढ़ सत्यत्वभ्रम हो जाने के कारण जम नहीं पाता, इसीलिए चिरकाल तक जीव को संसारबन्धन बार-बार हुआ करता है