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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

जगदहमसदित्युपेत्य सम्यग्जनधनदारशरीरनिर्व्यपेक्षः । भवति हि स च चेतनस्वरूपः परिमितखं खलु नान्यथास्ति मुक्तिः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए शास्त्रों मे दृढ विश्वास करके "जगत्‌ और अहन्ता-ये दोनों असत्‌ हैं, इसको” श्रवण, मनन आदि के अभ्यास द्वारा भलीभाँति जानकर अपने धन, जन, स्त्री तथा शरीर आदि में आसक्तिशून्य हो परमार्थ तत्त्व को जानकर उपाधि से परिच्छिन्न चिदाकाश जीव ओर जगत्‌ चिन्मात्रस्वरूप हो जाता है । वही इस जीव की मुक्ति है, यही इसका उपाय है । इस ज्ञान से भिन्न किसी दूसरे ज्ञान से इसकी मुक्ति कभी नहीं हो सकती