Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
सर्गेऽनर्गल एवायं ब्रह्मात्मकतयाक्षयः ।
अन्यथा तु न सर्गोऽयमस्ति नास्ति च सन्ति वा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चुषुप्ति और प्रलय में सर्ग तो अपने आप ही नष्ट हो जाते है, अतः उसमें ब्रह्मरूपता के
परिज्ञान से कौन-सा लाभ हुआ ? उक्त शंका पर कहते हैं ।
जगत् में ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से उसका मूलोच्छेदपूर्वक अर्थात् पुनः उत्पन्न न होना, क्षय है ।
इसके विपरीत कोई दूसरे मार्ग से वैसा क्षय नहीं होता, क्योकि प्रलय और सुषुप्ति आदि में
जो क्षय होता है उसमें यह सृष्टि बीजरूप से रहती है, कार्यरूप से नहीं रहती अथवा एेन्दव
आख्यान की रीति से प्रलय में भी कार्य बने ही रहते हैं