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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

येषां च विद्यते सर्गः स्वप्नपुंसामिवासताम् । स सर्गः पुरुषास्ते च मृगतृष्णाम्बुवीचिवत् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

तब सृष्टि के रहते भल्रा प्रलय व्यवहार कैसे 2 इस पर कहते हैं / स्वप्नपुरुष के तुल्य जिन असत्‌ पुरुषों की दृष्टि में यह सृष्टि है, वह सृष्टि तथा वे पुरुष मृगतृष्णाजल के तरंग के समान हैं । तात्पर्य यह है कि प्रलय का संकल्प करनेवाले की दृष्टि से उन सबकी सत्ता न होने के कारण अपने संकल्पित सम्पूर्णं जगत्‌ के नाश से ही उसका प्रलय व्यवहार होता है