Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
भूतादिमयतां त्यक्त्वा बुद्ध्यहंकारचेतसाम् ।
अत्यन्तं स्थितिरभ्येति यदि तन्मुक्ततोदिता ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक हैं, ऐसा ही सही, परन्तु इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते हैं /
उस बुद्धि आदि घटित सूक्ष्म शरीर में अहंभाव से प्रविष्ट हुआ चिदात्मा उसके द्वारा स्थूल देह
को भी अविद्या के कारण “यह मैं ही हूँ” ऐसा मानता है । विवेक द्वारा बुद्धि, अहंकार और चित्त की
भूतादिरूपता को "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” इस श्रुति में दिखलाये गये उपाय से छोड़कर
यदि उसकी स्वप्रकाश चिन्मात्रस्वभाव से स्थिति हो जाय, तो फिर मुक्तता भी आविर्भूत हो ही
गई, यह समझ लेना चाहिए । उसीको मैंने आलोक कहा है, यह तात्पर्य हे