Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
चिच्छ्लिष्टा चेत्यनिष्ठत्वात्तादृश्येवात्र कास्तिता ।
तस्मात्केव कुतः कुत्र वासना किंस्वरूपिणी ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
ङस प्रकार आत्मप्रकाश के प्रछत होने पर कासना भी बाधित हो जाती हैं, इसलिए उस वासना
से भी संसारवन्ध की प्रसक्ति नहीं हो सकती, यह कहते हैं ।/
विषयों की ओर उन्मुख होने के कारण चिति लिंग शरीररूपी उपाधि में यदि मिलित है, तो
उसकी वासना भी उस लिंग शरीर के सदृश ही मिथ्या है, अतः मुक्तता-अवस्था में उसका बाध
होने से वह वासना कैसी, कहाँ से, कहाँ पर ओर किस स्वरूप की हो सकती है?