Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यस्य चैष भ्रमः सोऽसन्प्रेक्षयासन्न लक्ष्यते ।
मृगतृष्णाम्बुवत्तेन संसारः कस्य कः कुतः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्वज्ञान होने पर बद्ध जीव की ही जक उपलब्धि नहीं होती, तब भला किसके द्वारा किसके
बंधन की प्रसक्ति 2 यह कहते हैं ।
जिस जीव को इस संसार का भ्रम है, वह असत् ही है जो असत् होता है, वह तत्त्वदृष्टि से
देखनेपर मृगतृष्णा जल की नाईं लक्षित ही नहीं होता, इससे किसको कहाँ से कौन-सा
संसार ?