Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
तदेवं तर्हि तस्य स्यादिति चित्तोदयो हि यः ।
पुनः स एव संसारविभ्रमः संप्रवर्तते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मप्रकाश के मन्द पड़ जाने पर तो फिर चित्त का उदय हो जाने से संसार हो ही सकता हैं,
इसलिए आत्मप्रकाश को तब तक ढ़ कनाये रखना चाहिए जब तक कि संसार की बिलकुल
विस्युति न हो जाय यानी उसकी पुन:स्युति का अवसर न आने पाये, यह कहते हैं /
इससे इस तरह आत्मज्ञान के लिए प्रवृत्त हुए पुरुष के विषयों का स्मरण करने से जो पुनः चित्त
का उदय होगा, वही फिर संसाररूप से प्रवृत्त हो जायेगा