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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

अथवा शान्ततैवास्य निर्वाणस्यावशिष्यते । निर्वासनः किल मुनिः कथं व्यवहरत्वसौ ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा निर्वाणरूप सप्तम भूमिका में प्राप्त इस ज्ञानी की शान्तरूपता ही अवशिष्ट रहती है, क्योकि वासनारहित मुनि कैसे व्यवहार कर सकता है