Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
कोशेऽस्ति पद्मबीजस्य यथा सर्वाब्जिनी तथा ।
अनन्या स्वप्नविभ्रान्तिरात्मन्यस्ति न बाह्यता ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ङ्त तरह व्रह्म में स्वाभाविक भावना के अनुसार जयद्गप है तथा शाख्रीय तत्वभावना के
अनुसार तात्विकरूप भी हैं, इसलिए अपनी इच्छा के अनुसार मनुष्य अनर्थ या पुरुषार्थ दोनों प्राप्त
कर सकता हैं, उसके लिए दोनों ही चुलभ है; इस आशय से कहते हैं /
जैसे कमल के बीज कोष के अन्दर ही अभिन्नरूप से सम्पूर्ण कमलिनियाँ स्थित है, वैसे आत्मा
में ही सवप्नभ्रान्ति रूप यह जगत अनन्य होकर स्थित है, आत्मा को छोड़कर अन्यत्र नहीं