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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

कलनारहितं शान्तं यद्रूपं परमात्मनः । भवत्यसौ तत्तद्भावादतद्भावान्न तद्भवेत् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए वास्तविक भी ब्रह्मभाव अपनी भावना के अधीन ही है, यह जो कहा गया हैं वह सिद्ध हो गया, यह कहते हैं। कल्पनाओं से रहित, शान्त जो परमात्मा का रूप है वह तत्‌-तत्‌ रूपों मेँ परिणत हो जाता है तथा भावना न करने से तत्‌-तत्‌ रूपों मे परिणत नहीं होता