Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
स्वप्नादिज्ञानसंशान्तौ यद्रूपं शुद्धमैश्वरम् ।
न तदस्ति न तन्नास्ति न वाग्गोचरमेव तत् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्नादिज्ञान के शान्त होने
पर जो विशुद्ध ईश्वर का रूप अवशिष्ट रहता है वह “अस्तिता' के निरूपक काल और देश आदि
के आधार का अभाव रहने से “वह है" यह नहीं कहा जा सकता तथा स्वरूप का बाध न रहने से
"वह नहीं है” यह भी नहीं कहा जा सकता । इसलिए वह वाणी का विषय कदापि नहीं है