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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

वायौ द्वन्द्वमिवात्रेदं जगदादि च भासते । कोऽहं कथमिदं चेति विचारेणैव शाम्यति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वायु में कल्पित द्रव्य ओर क्रिया की नाई इस आत्मा में यह सब जगत्‌ जीव आदि कल्पित ही हे । वह सब भें कौन हूँ ” यह कैसे उत्पन्न हुआ इस विचार से नष्ट हो जाता है