Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वादयक्षेऽप्यभ्युदिते बालस्येव विपश्चितः ।
युक्तियुक्तमलं मुख्यमुदेत्यहमिति भ्रमः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
भले ही वादरूप पिशाचिनी उत्पन्न हो, इसमें क्या दोष है 2 इस पर कहते हैं /
जब वादरूपी यक्ष उत्पन्न होगा, तब बालक के सदृश ज्ञानी श्रोता को भी तर्कयुक्त यानी
तार्किकों के द्वारा प्रतिपादित हो रहा आत्मा का स्वरूप ही मुख्य है ओर वही मुख्य मेरे लिए
पर्याप्त है, ऐसा भ्रम हो जाता है, अन्धगोलांगूल न्याय से उसका अवलम्बन करना अनर्थ का
ही कारण होगा