Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
एषोऽर्थः संभवत्येव तेनेदं कथयाम्यहम् ।
स्वानुभूतं वयं बाला नासमञ्जसवादिनः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे कटे ग्रये क्वनो में आप असम्भव की शका न करे यह कहते है/
हे रामभद्र, मैंने जो कुछ अर्थ कहा है, वह सब सम्भव ही है, असम्भव नहीं, इसीलिए मैंने इस
अपने अनुभूत अर्थं का आपसे वर्णन किया है । यह आप ध्यान रखिए कि हम लोग असम्बद्ध
कहनेवाले बालक नहीं है