Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
परलोकमहाव्याधौ यत्नेनाशु चिकित्सिते ।
इहलोकमयो व्याधिः स्वयमाशूपशाम्यति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस लोक की व्याधि की चिकित्सा के लिए दूसरे यत्न की आवश्यकता नहीं है, यह कहते हैं ।
परलोकरूप व्याधि की यत्नपूर्वक तत्काल ही चिकित्सा करने पर इस लोक की व्याधि स्वयं
अपने-आप ही शान्त होने लग जाती है