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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

संविन्मात्रं विदुर्जन्तुं तस्य प्रसरणं जगत् । परमाणूदरेऽप्यस्ति तच्छैलशतविस्तरम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

परलोक की व्याधि के (लिए यद्यापि तपश्चर्या: तीर्थाटन, यज्ञ आदि चिकित्सा वला यह है, तथापि उनसे उक्त व्याधि निर्युल नष्ट नहीं होती, किन्तु आत्मज्ञान से ही निर्युल नष्ट होती हैं / आतज्ञान तो श्रवणाविपूर्वक समाधि के अभ्यास से यानी विति की बहियुखिता के निरोध पे होता है, इस आशय से आत्मज्ञान करा उपाय बतलाने के लिए भ्रूमिका बोधते है/ जितने जन्तु हैं, वे सब संविन्मात्ररूप (आत्मा के ही स्वरूप) हैं, इस संवित्‌ की बहिर्मुखता ही जगत्‌ है । यह सारा जगत्‌ एक छोटे से परमाणु के उदर में भी सैकड़ों पर्वतों के विस्तार में विद्यमान है, क्योकि वहाँ पर भी संवित्‌ बैठी ही है