Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यत्संविदः प्रसरणं रूपालोकमनांसि तत् ।
व्योमन्येवानुभूयन्ते नातः सत्यो जगद्भ्रमः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जो आत्मचिति का बहिर्मुखता से विस्तार है, वही
बाह्य विषय और भीतरी विषय (काम, संकल्प आदि) हैं । ये चिदाकाश में ही अनुभूत होते हैं,
इसलिए जगत् का भ्रम कभी सत्य नहीं हो सकता