Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
भोगपङ्कार्णवे मग्न आत्मा नोत्तार्यते यदि ।
स्वपौरुषचमत्कृत्या तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मज्ञान स्रम्पादन में कौन-कौन उपाय है 2 इस प्रश्न पर वैरग्य ही पहला उपाय हैं,
यह कहते हैं /
यदि पुरुष अपने पौरुषरूप चमत्कार से भोगरूप कीचड़ में फँसी हुई अपनी आत्मा का उद्धार
नहीं करता, तो फिर दूसरा कोई भी उपाय उसके उद्धार का रहता ही नहीं