Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञस्य जीवितनदी सकल्लोलाप्यसंभ्रमा ।
समं वहति सौम्यैव चित्रसंस्थेव नीरसा ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
शय से शान्ति देनेवाला“ यह जो विशेषण कहा ग्या है, उसका तात्पर्य ज्ञानी और अज्ञानी की
आउदुरूप नदी की विलक्षणता वर्णन से दिखलाते हैं /
जो तत्त्वज्ञानी पुरुष है, उसकी आयुरूप नदी कल-कल ध्वनि करती हुई (प्रारब्ध प्राप्त
अनेक प्रवृत्तिरूप तरंगों से युक्त होती हुई) भी जगत्भ्रमों से शून्य है । अतएव चित्र में चित्रित
जलशून्य नदी के सदृश एकरूप एवं सौम्य (उपद्रवरहित) होकर बहती-रहती है