Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
संविद्वारितरङ्गौघा भान्ति सर्गाः सहस्रशः ।
विचारितास्त्वसत्यास्ते सत्यास्त्वनुभवभ्रमात् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, संवित्-रूपी जल के तरंग ही हजारों सृष्टियों के रूपों मे भासते हैं। जब उनके
विषय में विचार किया जाता है, तब वे असत्य बन जाते हैं और जब विचारित नहीं होते तब
अज्ञानियों के अनुभव से सत्य भासने लग जाते हैं