Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
जगन्त्याकाशकोशेऽपि संवित्प्रसरणभ्रमात् ।
सन्तीवाप्यनुभूयन्ते न तु सत्यानि तानि तु ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा की बहिर्मुखता के भ्रम से ही
आकाश में भी अनेक तरह के गन्धर्वनगर आदि जगत् सत्य-से भासने लगते हैं, परन्तु विचार करने
पर वे सत्य नहीं ठहरते