Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
संविन्निर्वाणमजगत्संविदुन्मीलनं जगत् ।
नान्तर्न बाह्यं नासत्यं न सत्यं सर्वमेव तत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा की बहिर्मुखता न होना ही समस्त जगत् की निवृत्ति है ओर आत्मा की
बहिर्मुखता ही सम्पूर्ण जगत् है । वास्तव में न कुछ भीतर है, न बाहर है, न असत्य है, न सत्य है।
जो कुछ है, वह सर्वात्मिक ब्रह्म ही है