Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यथास्थितस्यैव सतो यस्यासंवेदनात्मकम् ।
संवित्प्रशमनं जातं तमाहुर्मुनिसत्तमम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
ङस प्रकार के ब्रह्मरूप की प्राप्तिकर स्थित रहना ही योगियों के लिए बहियुखिता का अभाव
ओर मोन (मननित्व) है, यह कहते हैं ।
भद्र, जिस तरह की मैंने स्थिति बतलाई, उस तरह की स्थिति से ही स्थित रहे जिस महामति
को बाह्यविषयों का अज्ञानरूप आत्मशमन उत्पन्न हो गया है, उसीको सब मनुष्यों में उत्तम मुनि
कहते हैं