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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

सतोऽपि मृन्मयस्येव यस्यासंवेदनात्मकम् । साहं जगद्विगलितं तमाहुर्मुनिसत्तमम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी महात्मा को उत्तम मुनि कहते हैं, मिट्टी की मूर्ति के सदृश जिसका शरीर रहते भी विषयवेदनाशून्यरूप जीवभाव के साथ जगत्‌ नष्ट हो गया है