Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
वर्जयित्वाहमित्येव नाविद्यास्तीतरात्मिका ।
शान्ते त्वभावनादस्मिन्नान्यो मोक्षोऽस्ति कश्चन ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्तर अनहम्भावरूप प्रतिकल्पना करनी चाहिए, यह कहते हैं ।
एकमात्र अहम्भाव को छोड़कर दूसरी कोई अविद्या है ही नहीं, इसलिए समस्त भावनाओं
को दूर कर देनेवाले तत्त्वसाक्षात्कार से इस अहम्भाव के बाधित हो जाने पर दूसरा कोई
मोक्षनामक पदार्थ प्राप्त करने लायक रहता ही नहीं यानी अहम्भाव का नाश ही मोक्ष है