Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैव कचतीवेदं सत्तयाच्छजगत्तया ।
चिद्रूपत्वाद्द्रवात्मत्वात्तरङ्गादितयाब्धिवत् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, चितिरूप होने के कारण यह ब्रह्म ही अपनी सत्ता से
सुन्दर जगत् के रूप में ऐसे भासता है, जैसे द्रवरूप होने के कारण सागर तरंगों के रूप में भासता
हे