Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
काकतालीयवद्भ्रान्तमहं ब्रह्मणि भासते ।
स्वमेव रूपं दृग्भ्रान्तौ केशोण्ड्रकमिवाम्बरे ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म में काकतालीय न्याय से
अकस्मात् ही भ्रान्त यह अहंकार ऐसे भासता है, जैसे कि दृष्टि की भ्रान्ति होने पर आकाश
में अपना ही रूप केशोण्ड्क के रूप में भासता है