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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

यथोर्म्यादि जले वृक्षे यथा वा शालभञ्जिका । यथा घटादयो भूमौ तथा ब्रह्मणि सर्गता ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे शान्त जल में अप्रकाश्य तरंग आदि हैं, या न खोदे गये काठ में अदृश्य कठपुतलियाँ हैं अथवा भूमि में अदृश्य घट आदि हैं, वैसे ही ब्रह्म में यह सृष्टि का रूप है