Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अन्तःशान्तमनायासमनुपाधि गतभ्रमम् ।
जगत्यसंभवादेव व्योमवत्सममास्यताम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, आप भीतर से शान्त, प्रयत्नो से निर्मुक्त,
उपाधि से रहित, भ्रम से शून्य होकर आकाश के समान निर्विक्षेप हो स्थित रहिये, क्योकि वर्णित
रीति से आपसे भिन्न कोई दूसरा जगत् है ही नहीं